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The Three Fundamental Principles (Book - Hindi)
A book in Hindi in which the author shows the fundamentals principles that a Muslim has to know about Allah, Islam, and the Prophet Muhammad. He also shows the types of worship that Allah commanded in a brief and easy explanation.
Contributors
AuthorsMuhammad Bin Abdul WahhabSaeed Ahmad Hayat Almusharrafy
TranslatorsSaeed Ahmad Hayat Almusharrafy
Sourcesiu - The Islamic University Website in Almadinah AlmunawaraCooperative Office for Propagation , Guidance , and Warning of Expatriates in the city of Albatha
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मुझे यह आपके साथ साझा करके खुशी होगी:
📘 धर्म के तीन मूल आधार (हिन्दी)
📝 तीन मूल सिद्धान्त और उनके प्रमाण वह बातें जिनका सीखना हर मुसलमान पर अनिवार्य है इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) का धर्म हनीफ़िय्यत यही है कि केवल एक अल्लाह की इबादत की जाए इबादत के वह प्रकार जिनका अल्लाह ने आदेश दिया है दूसरा सिद्धांत : इस्लाम (धर्म) को प्रमाण सहित जानना पहली श्रेणी : इस्लाम दूसरी श्रेणी : ईमान तीसरी श्रेणी : एहसान, इसका केवल एक ही स्तंभ है तीसरा सिद्धान्त : अपने नबी मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को पहचानना तीन मूल सिद्धान्त और उनके प्रमाण लेखक : शैख़ुल इस्लाम मुहम्मद बिन अब्दुल वह्हाब वह बातें जिनका सीखना हर मुसलमान पर अनिवार्य है बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम जान लो, अल्लाह तुमपर दया करे, हमारे लिए चार बातों को सीखना ज़रूरी है। पहली बात : ज्ञान, और इसका अर्थ है अल्लाह, उसके नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) तथा इस्लाम धर्म को तर्कों और प्रमाणों के साथ जानना। दूसरी बात : उस जानकारी पर अमल करना। तीसरी बात : उस ज्ञान और अमल की ओर दूसरे लोगों को बुलाना। चौथी बात : ज्ञान और अमल एवं इनकी ओर दूसरे लोगों को बुलाना की राह में आने वाली कठिनाइयों तथा परेशानियों को धैर्य के साथ सहना। इसका प्रमाण, अल्लाह तआला का यह फ़रमान है : शुरू करता हूँ अल्लाह के नाम से, जो बड़ा दयालु एवं अति दयावान है।"सौगंध है काल की।निस्संदेह, सारे लोग घाटे में हैं।सिवाय उन लोगों के, जो ईमान लाए, नेक काम किए तथा एक-दूसरे को सत्य को अपनाने की नसीहत करते रहे और धैर्य का उपदेश देते रहे।" [1] इमाम शाफ़िई -उनपर अल्लाह की कृपा हो- कहते हैं : यदि अल्लाह तआला, अपनी सृष्टि पर तर्क के तौर पर यही एक सूरा उतार देता और इसके सिवा कुछ न उतारता, तो काफ़ी होती। इमाम बुख़ारी (रहिमहुल्लाह) अपनी मशहूर किताब (सहीह बुख़ारी शरीफ़, भाग : 1, पृष्ठ : 45) में फ़रमाते हैं : अध्याय : कहने और करने से पहले ज्ञान प्राप्त करने की आवश्यकता। इसका प्रमाण अल्लाह तआला का यह फ़रमान है :"जान लो कि अल्लाह के अतिरिक्त कोई अन्य पूज्य नहीं है और तुम अपने पापों की क्षमा माँगो।" [2] हम देखते हैं कि इस आयत में अल्लाह तआला ने कथनी तथा करनी से पहले ज्ञान का ज़िक्र किया है। आप यह भी जान लें -आप पर अल्लाह की कृपा हो- कि प्रत्येक मुसलमान पर, पुरुष हो या महिला, निम्नलिखित तीन बातों को जानना तथा उन पर अमल करना अनिवार्य है। पहली बात : बेशक अल्लाह ही ने हमें पैदा किया है, उसी ने हमें जीविका प्रदान की है और उसने हमें यूँ ही बेकार नहीं छोड़ दिया, बल्कि हमारी ओर रसूल भेजा। अतः जो उनका आज्ञापालन करेगा वह स्वर्ग में जाएगा और जो अवज्ञा करेगा, वह नरक में प्रवेश करेगा। इसका प्रमाण, अल्लाह तआला का यह कथन है : " (ऐ मक्का वालो!) हमने तुम्हारी ओर (उसी प्रकार) एक रसूल (मुहम्मद) को, गवाह बनाकर भेजा है, जिस प्रकार, हमने फ़िरऔन की ओर एक रसूल (मूसा को) भेजा था।किन्तु फ़िरऔन ने रसूल की बात नहीं मानी, तो हमने उसको बड़ी सख़्ती के साथ दबोच लिया।" [3] सूरा अल-मुज़्ज़म्मिल, आयत संख्या : 15,16| दूसरी बात : यह है कि अल्लाह तआला को कदापि यह पसंद नहीं है कि उसकी उपासना में किसी अन्य को साझी बनाया जाए, यद्यपि वह कोई अल्लाह का निकटवर्ती फ़रिश्ता या अल्लाह की ओर से भेजा हुआ रसूल ही क्यों न हो। इसका प्रमाण, अल्लाह तआला का यह कथन है : "और मस्जिदें अल्लाह ही के लिए हैं। अतः अल्लाह के अतिरिक्त किसी अन्य को कदाचित न पुकारो। [4] सूरा अल-जिन्न, आयत संख्या : 18 | तीसरी बात : जिसने रसूल का अनुसरण किया तथा अल्लाह को एक स्वीकार कर लिया, उसके लिए यह कदापि वैध नहीं है कि अल्लाह एवं उसके रसूल के शत्रुओं से वैचारिक समानता और इसके आधार पर पनपने वाला मोह रखे, यद्यपि वे उसके अत्यंत निकटवर्ती ही क्यों न हों। इसकी दलील, अल्लाह तआला का यह फ़रमान है : "आप अल्लाह एवं आख़िरत के दिन पर विश्वास रखने वाले लोगों को नहीं पाएंगे कि अल्लाह एवं उसके रसूल का विरोध करने वालों से प्यार करते हों, चाहे वे उनके पिता अथवा उनके पुत्र अथवा उनके भाई अथवा उनके परिजन हों। वे वही लोग हैं जिनके दिल में अल्लाह ने ईमान लिख दिया है तथा जिनका समर्थन मैं ने अपने द्वारा भेजे गए वह्य और ईश्वरी सहायता से किया है। तथा उनको ऐसे स्वर्गों में प्रवेश देगा जिनके नीचे से नहरें बहती होंगी और वे उनमें सदावासी होंगे। अल्लाह उनसे प्रसन्न हो गया तथा वे भी उससे प्रसन्न हो गए। यही अल्लाह का समूह है और सुन लो कि अल्लाह का समूह ही सफल होने वाला है। [5] सूरा अल-मुजादिला, आयत संख्या : 22 । इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) का धर्म हनीफ़िय्यत यही है कि केवल एक अल्लाह की इबादत की जाए जान लो -अल्लाह तुम्हें अपने आज्ञापालन का सुयोग प्रदान करे- कि इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) के धर्म हनीफ़िय्यत का अर्थ यह है कि आप केवल एक अल्लाह की इ...
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